वो पौराणिक तालाब.. जहां नागों की शैय्या पर विराजमान हैं भगवान विष्णु, शिवजी ने किया था निर्माण

0
114
Webvarta Desk: देशभर में कई अद्भुत व आकर्षक मंदिर (Temples in India) हैं जिनकी सुंदरता किसी भी व्यक्ति को अपनी तरफ खींच सकती है। उन्हीं मंदिरों में से एक मंदिर (Budhanilkantha Temple) नेपाल के काठमांडू से लगभग 10 किलोमीटर दूर है।

नेपाल के शिवपुरी में स्थित विष्णुजी (Lord Vishnu) का मंदिर बहुत ही सुंदर व सबसे बड़ा मंदिर है। मंदिर अपनी नक्काशियों के लिए बहुत प्रसिद्ध है, यहां स्थापित मंदिर बुढ़ानिलकंठ मंदिर (Budhanilkantha Temple) नाम से जाना जाता है। मंदिर में श्री विष्णु की सोती हुई प्रतिमा विराजित है। जो की लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

मंदिर में विराजमान है भगवान विष्णु की शयन प्रतिमा

बुढ़ानिलकंठ मंदिर (Budhanilkantha Temple) में भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की शयन प्रतिमा विराजमान है, मंदिर में विराजमान इस मूर्ति की लंबाई लगभग 5 मीटर है और तालाब की लंबाई करीब 13 मीटर है जो की ब्रह्मांडीय समुद्र का प्रतिनिधित्व करता है। भगवान विष्णु की इस प्रतिमा को बहुत ही अच्छे से बनाया व दर्शाया गया है।

तालाब में स्थित विष्णुजी की मूर्ति शेषनाग की कुंडली में विराजित है, मूर्ति में विष्णुजी (Lord Vishnu) के पैर पार हो गए हैं और बाकी के ग्यारह सिर उनके सिर से टकराते हुए दिखाए गए हैं। विष्णु जी की इस प्रतिमा में विष्णु जी चार हाथ उनके दिव्य गुणों को बता रहे हैं, पहला चक्र मन का प्रतिनिधित्व करना, एक शंख चार तत्व, एक कमल का फूल चलती ब्रह्मांड और गदा प्रधान ज्ञान को दिखा रही है।

मंदिर में अप्रत्यक्ष रूप से विराजमान है भगवान शिव

इस मंदिर में भगवान विष्णु प्रत्यक्ष मूर्ति के रूप में विराजमान हैं वहीं भगवान शिव (Lord Shiva) पानी में अप्रत्यक्ष रूप से विराजित हैं। बुदनीलकंठ के पानी को गोसाईकुंड में उत्पन्न माना जाता है और यहां लोगों का मानना है कि अगस्त में होने वाले वार्षिक शिव उत्सव के दौरान झील के पानी के नीचे शिव की एक छवि देखी जा सकती है।

पौराणिक कथा के अनुसार मंदिर का महत्व

पौराणिक कथा के अनुसार जब समुद्र मंथन के समय समुद्र से हलाहल यानि विष निकला तो सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए इस विष को शिवजी ने अपने कंठ में ले लिया और तभी से भगवान शिव का नाम नीलकंठ पड़ा। जब जहर के कारण उनका गला जलने लगा तो वे काठमांडू के उत्तर की सीमा की ओर गए और एक झील बनाने के लिए अपने त्रिशूल के साथ पहाड़ पर वार किया और इस झील के पानी से अपनी प्यास बुझाई, इस झील को गोसाईकुंड के नाम से जाना जाता है।

नोट: हमारा उद्देश्य किसी भी तरह के अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। यह लेख लोक मान्यताओं और पाठकों की रूचि के आधार पर लिखा गया है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here