कलाकारों के प्रेरणा स्रोत रहेंगे ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार

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-नागेन्द्र प्रसाद रतूड़ी-

‘ये देश है वीर जवानों का’, ‘अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं। ‘हे रामचन्द्र कह गये सिया से’ जैसे कालजयी गानों पर अभिनय करने वाले 98 वर्षीय दिलीप कुमार के नाम प्रसिद्ध अभिनेता मोहम्मद यूसुफ खान के हिन्दुजा अस्पताल में अन्तिम सांस लेने के साथ ही एक ऐसे युग ता समापन हुआ जिसने हिन्दी सिनेमा की स्थापना से लेकर श्वेतश्याम से लेकर रंगीन व आधुनिक कम्यूटर तकनीकी को जिया है। दिलीप कुमार का जन्म 11 दिसम्बर सन् 1922 ई०में हिन्दुस्तान के किस्साखानी बाजार पेशावर में फल विक्रेता लाल गुलाम सरवर के यहां हुआ। इनकी माता का नाम आयशा बेगम था। ये 12 भाई बहन थे। इनके भाईयों का नाम- नासिर खान, एहसान खान, असलम खान, नूर मोहम्मद, अयुब सरबार, तथा बहनें- फौजिया, सकीना, ताज, फरीदा, सईदा, अख्तर, आसिफ थे।

दिलीप कुमार के पिता सन् 1930 में परिवार सहित मुंबई आ गये थे, बड़ा परिवार होने के कारण और पिता की आय कम होने के कारण इन्हें एक कैण्टीन में काम करना पड़ा।पर इनकी मंजिल तो अभिनय की दुनिया पर राज करना था सो ऊपरवाले ने इनके एक परिचित के माध्यम से तत्कालीन समय की मशहूर हस्ती बाम्बे स्टूडियो की स्वामिनी देवकी रानी के सम्पर्क में ला दिया।देवकी रानी की सलाह पर इन्होंने अपना नाम दिलीपकुमार रखा।देवकीरानी ने इन्हें अपने स्टुडियो में 1250 रुपये मासिक के ऐग्रीमेंट मे बतौर कलाकार रख लिया।

इनकी पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा’ जो सन् 1944 में बनीं ।पर वह चल नहीं पायी। इनकी दूसरी फिल्म ‘जुगनू’ जो सन् 1947 में बनी। यह फिल्म सफल रही और मोहम्मद यूसुफखान दिलीप कुमार के नाम से फिल्म की दुनिया में सफलतापूर्वक स्थापित हो गये। सन् 1949 में राजकपूर व नर्गिस के साथ इन्होंने ‘अंदाज’ फिल्म में काम किया। जो उस समय की सबसे सफल फिल्म रही। इसके बाद इन्होंने ‘जोगन’, ‘दीदार’, ‘दाग’ जैसी सफल फिल्में दीं।’दाग’ में किए अभिनय के लिए इन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।

फिल्म ‘देवदास’ जो सन् 1955 में बनी, में शराबी के जीवंत अभिनय ने इनके अभिनय के झंडे गाढ दिए। सन् 1960 में ‘मुगल ए आजम’ फिल्म के बाद वेअभिनय के महानायक बन गये। फिल्म राम और श्याम में इनका डबल रोल था। सन् 1981 में ‘क्रांति’, सन् 1982 मे ‘विधाता’, सन् 1984 में दुनिया, सन् 1986 में ‘कर्मा’, 1990में ‘ईज्जतदार’, सन् 1991 में ‘सौदागर’ तथा सन् 1998 में ‘किला’ फिल्म मे उन्होंने काम किया। जो कि इनकी अंतिम फिल्म है। इस प्रकार उन्होंने 60 से अधिक फिल्मों मे कार्य किया। इनकी अधिकतर फिल्में त्रासद रहीं। जिससे इन्हें ट्रेजडी किंग कहा जाता है।

सन् 1966 में 44 वर्षीय दिलीप कुमार नेअपने से 22 साल छोटी सायराबानो से विवाह किया जो उस समय की स्थापित व खूबसूरत अभिनेत्री थी। इसके बाद दलीप कुमार ने सन् 1980 में आस्मां रहमान से विवाह किया जो असफल रहा। शीघ्र ही इनका तलाक हो गया। इनकी कोई संतान नहीं थी। अन्तिम समय में इनकी पत्नी सायरा बानो इनके पास रहीं। दोनों की आयु में 22 साल का अन्तर होने पर भी दोनों का विवाह 50 साल से अधिक चला।

सन् 1991 में इन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार, सन् 1993 में फिल्मफेयर लाईफ टाईम एचीवमेंट अवार्ड, सन् 1994में इन्हें दादासाहब फाल्के फुरस्कार तथा सन् 1998 में इन्हें पाकिस्तान सरकार ने निशान-ए-पाकिस्तान मिला। जिसे ग्रहण करने पर इनकी आलोचना भी हुई। कहा जाता है कि दिलीप साहब के प्रारम्भिक दौर में कामिनी कौशल व मधुबाला आदि से अफेयर भी रहा। यद्यपि वे 98 साल की एक संपूर्ण जिन्दगी जी चुके थे फिर भी उनके निधन से सिने कला जगत को अपूरणीय क्षति पहुँची है। वे अभिनय के पूरे महाविद्यालय थे। उन्होंने अभिनय जगत में जो स्थान बनाया है वह नये कलाकारों के लिए हमेशा प्रेरणाप्रद रहेगा।

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