हॉन्गकॉन्ग पर चीन की पकड़ मजबूत! चुनाव प्रणाली में किया बदलाव… जानें क्या है जिनपिंग का प्लान

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Webvarta Desk: चीन (China) की संसद ने गुरुवार को हॉन्गकॉन्ग (Hong Kong) की चुनाव प्रणाली में बदलाव (China Parliament Approves Plan To Veto Hong Kong) के लिए वोटिंग की। जिसके बाद अब हॉन्गकॉन्ग में चीन की पकड़ और मजबूत हो गई है। चीनी शासन जब चाहे तब किसी भी उम्मीदवार का नामांकन न केवल रद्द कर सकता है, बल्कि चुने हुए विधान परिषद सदस्य को अयोग्य घोषित कर सकता है।

बताया जा रहा है कि इस कानून (China Parliament Approves Plan To Veto Hong Kong) के लागू होने से हॉन्गकॉन्ग में अब चीन की पसंद की ही सरकार सत्ता में रहेगी। चीन ने इस कानून का बचाव करते हुए कहा कि इससे पूरी ताकत हॉन्गकॉन्ग की देशभक्त सेना के हाथ में रहेगा।

वोटिंग से दौरान खुद शी जिनपिंग संसद में थे मौजूद

चीन की संसद नेशनल पीपुल्स कांग्रेस ने पिछले साल ही हॉन्गकॉन्ग में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू करते हुए कई लोकतंत्र समर्थक नेताओं को जेल में डाल दिया था। 1 जुलाई 2020 से लागू इस कानून के तहत अबतक कम से कम 1000 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

एक देश दो व्यवस्था के नाम से दुनिया को बरगलाने वाला चीन अब पूरी तरह से हॉन्गकॉन्ग पर नियंत्रण स्थापित करना चाहता है। शी जिनपिंग की रबर स्टैंप संसद का केवल एक सदस्य गुरुवार को हुई वोटिंग के दौरान अनुपस्थित रहा। इसके अलावा संसद में मौजूद सभी सांसदों ने इस कानून के पक्ष में अपना वोट दिया था। खुद राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली केकियांग इस दौरान संसद में उपस्थित रहे।

हॉन्गकॉन्ग में आंदोलन को खत्म करना चाहते हैं जिनपिंग

इस कानून को कई विशेषज्ञों ने हॉन्गकॉन्ग में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन के ताबूत की आखिरी कील बताया है। वहीं, चीन के संसदीय प्रवक्ता वांग चेन ने कहा कि इस फैसले का उद्देश्य शहर को मजबूती से देशभक्ति के साथ हॉन्गकॉन्ग की सेना के हाथों में बनाए रखना है। अभी तक इस कानून को लेकर चीन की संसद ने कोई खुलासा नहीं किया है, तब भी बताया जा रहा है कि हॉन्गकॉन्ग में चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की लिस्ट अब पेइचिंग से ही फाइनल होगी। अब हॉन्गकॉन्ग की विधान परिषद में चुना जाने वाला हर सदस्य चीन के इशारे पर काम करेगा।

1997 से चीन के कब्जे में है हॉन्गकॉन्ग

बता दें कि हॉन्गकॉन्ग ब्रिटिश शासन से चीन के हाथ 1997 में ‘एक देश, दो व्यवस्था’ के तहत आया और उसे खुद के भी कुछ अधिकार मिले हैं। इसमें अलग न्यायपालिका और नागरिकों के लिए आजादी के अधिकार शामिल हैं। यह व्यवस्था 2047 तक के लिए है।

1942 में हुए प्रथम अफीम युद्ध में चीन को हराकर ब्रिटिश सेना ने पहली बार हॉन्गकॉन्ग पर कब्जा जमा लिया था। बाद में हुए दूसरे अफीम युद्ध में चीन को ब्रिटेन के हाथों और हार का सामना करना पड़ा। इस क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए 1898 में ब्रिटेन ने चीन से कुछ अतिरिक्त इलाकों को 99 साल की लीज पर लिया था। ब्रिटिश शासन में हॉन्ग कॉन्ग ने तेजी से प्रगति की।

ब्रिटेन ने हॉन्गकॉन्ग को चीन को क्यों सौंपा

1982 में ब्रिटेन ने हॉन्गकॉन्ग को चीन को सौंपने की कार्रवाई शुरू कर दी जो 1997 में जाकर पूरी हुई। चीन ने एक देश दो व्यवस्था के तहत हॉन्गकॉन्ग को स्वायत्तता देने का वादा किया था। चीन ने कहा था कि हॉन्ग कॉन्ग को अगले 50 सालों तक विदेश और रक्षा मामलों को छोड़कर सभी तरह की आजादी हासिल होगी। बाद में चीन ने एक समझौते के तहत इसे विशेष प्रशासनिक क्षेत्र बना दिया।

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