कहां गया वो मन्दिर-मस्ज़िद का झगड़ा?

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कहां गया वो मन्दिर-मस्ज़िद का झगड़ा?
कहां गया वो ख़ुदा-भगवान का कलमा?
पड़ी है मानवता ख़तरे में
कहां गया वो पैसे वाले बड़े इंसान का जज़्बा?

कराह रही है आत्मा उसकी जिसके घर का गया जिगरा
भगवान अगर तुम हो ? परवर दिगार अगर तुम हो ? बचा लो इस धरा की अंतिम सांसों को,अम्बर की घुटती रातों को,

प्रकृति के कहर पर अब पहरा लगा
मानव जाति का सूर्य अस्त होने से बचा,प्रकृति पर ज़ुल्म करने वाली काली करतूतों को मिटा,
खुशियों की वर्षा कर , धरती अम्बर को मिला,मत अब इस धरा को श्मशान और कब्रिस्तान बना,
बिछड़न की पीड़ा अब यूं चारों तरफ मत फैला,

पढ़ती है वह हर रोज कलमा अपने परिवार की ख़ातिर,
पिरोती है वह हर रोज दुआ अपने मित्रों के दिदार की ख़ातिर,
गढ़ती है वह हर रोज खुशियों की ताबीज़ सलामती की ख़ातिर,

तू भी उनकी पीड़ा कम कर उनका ख़ुद में और विश्वास बढ़ा,
मनुजता पर छाई इन अंधेरी रातों में
अब अंकुरण के सुन्दर बीज फैला,
आओ मेरे राम,आओ मेरे रहीम
आओ मेरे अल्लाह, आओ मेरे करीम
मिलकर सब पृथ्वी के ग्रहण हटा,
सुख, शांति, समृद्धि से भरा अब आशा के दीप जला,

कहां गया वो मन्दिर-मस्ज़िद का झगड़ा?
कहां गया वो ख़ुदा-भगवान का कलमा?
पड़ी है मानवता खतरे में
कहां गया वो पैसे वाले बड़े इंसान का का जज़्बा।

-धर्मेन्द्र कुमार सिंह

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