ख़ुशनसीब प्रधानमंत्री बदनसीब देशवासी

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PM Modi

-निर्मल रानी-

2015 में जब एक बार अंतराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत कम होने के चलते भारत में भी डीज़ल व पेट्रोल के मूल्यों में मामूली से गिरावट आई थी उन दिनों दिल्ली के विधान सभा चुनाव हो रहे थे। उस समय द्वारका में एक चुनावी सभा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अपने प्रचलित अंदाज़ में जो भाषण दिया था आज उसका एक महत्वपूर्ण अंश प्रस्तुत करना बेहद ज़रूरी है। उनके भाषण की यह बानगी देखिये-‘डीज़ल के दाम कम हुए कि नहीं हुए? आपकी जेब में थोड़ा बहुत पैसा बचने लगा कि नहीं बचने लगा? आपका फ़ायदा हुआ कि नहीं हुआ? अब हमारे विरोधी लोग कहते हैं कि ये तो मोदी नसीब वाला है इसलिए हुआ है। अब मुझे बताइये आपको नसीब वाला चाहिए कि ‘कम नसीब चाहिए’?

चलो भई मान लिया नसीब वाला है, लेकिन रुपया तो आपकी जेब में बचा ना? अगर मोदी का नसीब देश की जनता के काम आता है तो इससे बढ़िया नसीब की बात क्या होती है भाई। ये देश का दुर्भाग्य रहा…….. अगर नसीब के कारण पेट्रोल के दाम कम होते हैं, अगर नसीब के कारण डीज़ल के दाम कम होते हैं, अगर नसीब के कारण सामान्य नागरिक के जेब के पैसे बच जाते हैं, तो फिर बदनसीब को लाने की ज़रुरत क्या है मेरे भाइयो?

इस भाषण ने उस समय मोदी भक्तों में इतना उत्साह पैदा किया था कि जनसभा में ‘स्थापित’ किये गए ‘भक्तजन ‘ काफ़ी देर तक मोदी-मोदी के नारे लगाते हुए झूमते देखे गए थे। यह और बात है कि दिल्ली की जनता ‘नसीब ‘ के झांसे में नहीं आई और ‘कम नसीब ‘ के हाथों में दिल्ली की सत्ता सौंप दी। यहां यह बताना भी ज़रूरी है कि किसी विरोधी ने कभी भी किसी भी अवसर पर मोदी को ‘नसीब वाला’ व्यक्ति या नसीब वाला प्रधानमंत्री कहकर संबोधित नहीं किया। यह स्वयं उनके दिमाग़ की उपज थी क्योंकि निश्चित रूप से नित नई धारणा गढ़ने में और उसी गढ़ी हुई धारणा पर लफ़्फ़ाज़ी करने में मोदी का कोई जवाब नहीं है।

आज प्रधानमंत्री के ‘नसीब वाले’ भाषण को याद करना इसलिए प्रासंगिक है कि डीज़ल-पेट्रोल व रसोई गैस की क़ीमत से लेकर कोरोना के बेक़ाबू हो रहे हालात तक, देश के लोग जिन हालात का सामना कर रहे हैं आख़िर यह हालात किस ‘नसीब वाले’ की देन है? न तो देश ने कभी सौ रूपये लीटर पेट्रोल की कल्पना की थी न ही शमशानों व क़ब्रिस्तानों में जलने व दफ़्न होने वालों की लंबी लाइनें, सड़कों पर हो रहे अंतिम संस्कार, और अंतिम संस्कार के लिए ‘प्रतीक्षा टोकन’ की उम्मीद की थी। इन हालात का ‘श्रेय’ भी तो आख़िर किसी ‘नसीब’ वाले को लेना ही चाहिए?

आज देश के अस्पतालों में मरीज़ों के लिये पर्याप्त बिस्तर नहीं, भर्ती मरीज़ों के लिए ऑक्सीजन नहीं, स्वयं भारत सरकार के मंत्री वी के सिंह अपने किसी परिजन के लिए बिस्तर की गुहार लगाते सुने गए? अस्पताल के शवगृहों में लाशों के ढेर, लाश ढोने के लिए एंबुलेंस की कमी, चिता जलने हेतु लकड़ियों के दाम कई जगह तीन चार गुने हो गए, आख़िर देश की यह दुर्दशा भी तो किसी के ‘नसीब’ का ही नतीजा’ है? अब इस समय वह ‘नसीब वाला ‘ अपनी पीठ क्यों नहीं थपथपा रहा है?

दरअसल गत 7 वर्षों से वर्तमान सरकार ने अपनी पूरी ताक़त समाज का धर्म आधारित ध्रुवीकरण करने में ही झोंक दी। और उसपर भी तुर्रा यह कि अपनी पीठ थपथपाने से फ़ुर्सत ही नहीं मिल रही है। जुमलेबाज़ी, आए दिन नए नए रूप धारण करना, बे सिर पैर के अतार्किक प्रवचन देना, ग़ैर भाजपाई राज्यों की सरकारों को अस्थिर करना, उनके विधायकों को डराना, ख़रीदना व सरकारों की तोड़ फोड़ करना, अस्पताल कम भाजपा कार्यालय अधिक बनाना, जमातियों को कोरोना का ज़िम्मेदार बताना और कुंभ आयोजन में ख़ामोश रहना इन्हीं नीतियों ने तो आज देश को यहाँ पहुंचा दिया है कि लाशों की गिनती करना भी मुश्किल हो गया है।

और जलती चिताओं को छुपाने के इंतेज़ाम करने पड़ रहे हैं? कोरोना मरीज़ों व कोरोना से मरने वालों के आंकड़े छुपाने पड़ रहे हैं? हमारे ‘नसीब वाले ‘ एवं ‘यशस्वी प्रधानमंत्री’ के अनुसार पहले कठिन प्रश्न हल किये जाने चाहिए। यह तो 2014 से ही स्वयं उन्हें भी सोचना चाहिए कि देश के सामने इस समय कठिन प्रश्न क्या हैं? बेरोज़गारी, मंहगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योगीकरण, विकास आदि या फिर नफ़रत की राजनीति, हिन्दू मुस्लिम, गाय, 370, तीन तलाक़, लव जिहाद, गाँधी-नेहरू विरोध, संघ की विचारधारा का प्रत्येक स्तर पर विस्तार, ग़ैर भाजपाई राज्यों में छल-बल से अपनी सरकारें बनाना?

डॉ. कफ़ील ख़ान जैसा समाजसेवी व्यक्ति आज कोरोना के दौर में जनता को अपनी सेवाएं देने के लिए तड़प रहा है परन्तु उत्तर प्रदेश सरकार उसके निलंबन को जानबूझकर वापस नहीं ले रही है। पिछले दिनों डॉक्टर कफ़ील ने मुख्यमंत्री आदित्य नाथ योगी को एक पत्र के माध्यम से इन शब्दों में गुहार भी लगाई कि -“माननीय मुख्य मंत्री जी, उत्तर प्रदेश सरकार- मैं बीआरडी आक्सीजन त्रासदी के बाद दिनांक 22-8-2017 से निलम्बित हूँ। कोरोना वायरस की दूसरी लहर पूरे भारत मे त्राही-त्राही मचा रही है। मेरा गहन चिकित्सा विभाग में 15 वर्षो से अधिक का अनुभव शायद कुछ ज़िन्दगियाँ बचाने में काम आ सके। अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि इस कोरोना महामारी में देश की सेवा करने का अवसर दें।

बाक़ी डॉक्टरों (डॉ राजीव मिश्रा- पूर्व प्रधानाचार्य, डॉ सतीश कुमार- मेंटेनेंस प्रभारी) की विभागीय कार्यवाही प्रचलित होने के बावजूद उनका निलम्बन समाप्त कर उनकी सेवा बहाली दिनांक- 04-03-2020 को कर दी गईं है परन्तु मेरे 36 से भी अधिक पत्र लिखने के बावजूद अधिकारियों द्वारा द्वेषपूर्ण मेरा निलम्बन समाप्त नहीं किया जा रहा है। हालांकि विभिन्न जांच अधिकारियों की रिपोर्ट तथा इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश में मुझे चिकित्सीय लापरवाही, भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त कर दिया गया है।

उच्च न्यायालय ने दिनाँक- 07-03-2019 तथा उच्चतम न्यायालय ने दिनांक- 10-05-2019 के अपने आदेश में 90 दिनों के भीतर मेरे निलम्बन पर विचार करने को कहा था पर अफ़सोस 1300 से अधिक दिनों से मैं निलम्बित हूँ। मैं किसी अन्य हॉस्पिटल/व्यवसाय में काम नहीं कर रहा हूँ। मैं दिल से इस महामारी के समय अपने देश के नागरिकों की सेवा करना चाहता हूँ। ‘मेरा निलम्बन समाप्त कर मुझे एक अवसर प्रदान करें चाहे महामारी के रोकथाम के बाद पुनः निलम्बित कर दें”।

परन्तु सरकार अपने ‘सांप्रदायिकतावादी ‘ चश्मे को उतारना ही नहीं चाहती। उधर डाक्टर हर्षवर्धन व संबित पात्रा जैसे कई भाजपाई डॉक्टर केवल टी वी पर अपना प्रवचन देकर, पार्टी व सरकार की पीठ थपथपा कर ही ‘राष्ट्र भक्ति ‘ का फ़र्ज़ निभाने में लीन हैं। जबकि इन्हें भी मरीज़ों की सेवा करने के लिए इस आपात स्थिति में सामने आना चाहिए। ख़ुशनसीब प्रधानमंत्री व उनकी ‘भक्त मण्डली’ को चाहिए कि वे देशवासियों की बदनसीबी पर नज़र डालते हुए अपनी प्राथमिकताओं को बदलें।

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