देश के चुनाव में ‘बाहरी और स्थानीय’ का मापदंड?

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Nirmal Rani
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-निर्मल रानी-

कहने को तो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारतवर्ष में होने वाले चुनाव पूरे भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिए कौतूहल का कारण बनते हैं। प्रायः दुनिया के कई देशों के नेता व अधिकारीगण भी इन चुनावों व इसकी प्रक्रिया को निकट से देखने के लिए भी भारत आते रहे हैं। परन्तु वास्तविकता तो यह है कि इस अति लोकप्रिय भारतीय संवैधानिक व लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का अब काफ़ी हद तक ह्रास हो चुका है।

कभी जो चुनाव सरकार व सत्ता की उपलब्धियों व उसकी नाकामियों पर आधारित हुआ करते थे,जो चुनाव पार्टियों के चुनावी घोषणापत्र में किये गए वादों को पूरा करने न करने पर आधारित होते थे वही चुनाव धीरे धीरे जाति व धर्म पर आधारित होते गए। वही चुनाव क्षेत्रीय राजनीति व भाषा आदि पर आधारित होते गए। परन्तु पिछले कुछ वर्षों से तो चुनाव प्रचार का ढर्रा ही बिल्कुल बदल चुका है।

राजनैतिक दलों की प्रतिद्वंदिता इस स्तर तक जा पहुंची हैं कि सत्ता हासिल करने के लिए राजनैतिक दलों के नेतागण एक दूसरे को बदनाम करने व नीचा दिखाने के लिए न केवल उन पर निजी स्तर पर हमले करने लगे हैं बल्कि उन्हें बदनाम करने व नीचा दिखाने के लिए उन्हें देश व देश की एकता व संप्रभुता का दुश्मन तक बताने लगे हैं। अपने विरोधियों को धर्म-जाति विशेष का हितैषी यहाँ तक कि चीन अथवा पाकिस्तान का हितैषी व भारत विरोधी भी बताने लगे हैं। और तो और देश में होने वाले चुनावों में अब बाहरी व स्थानीय जैसे निरर्थक आरोप प्रत्यारोप भी किये जाने लगे हैं।

नेताओं द्वारा जनता के बीच में इस तरह का विषवमन करने के ज़रुरत वैसे तभी होती है जब इनके पास विकास के लिए बात करने के लिए कुछ न हो। इनके पास न ही अपनी उपलब्धियां बताने के लिए कुछ हो और न ही चुनावों में किये गए वादों को पूरा करने का इनके पास कोई जवाब हो। ऐसे में सबसे आसान तरीक़ा यही होता है कि जनता को भावनाओं पर आधारित मुद्दों में उलझाकर उनका ध्यान वास्तविक व जनहितकारी मुद्दों से भटकाकर रखा जाए।

बंगाल के चुनावों में पूरी तरह से इन्हीं हथकंडों का इस्तेमाल किया गया। बंगाल में जबसे भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनाव प्रचार में ‘जय श्री राम’ के उद्घोष को अपने चुनावी प्रचार का सबसे प्रमुख ‘शस्त्र’ बनाया तभी से बंगाल चुनाव इन्हीं नेताओं की ‘संकीर्ण व स्वार्थी मानसिकता’ के चलते गोया देवी देवताओं का भी ‘युद्ध क्षेत्र’ बन गया। ममता बनर्जी ने ‘जय श्री राम’ के जवाब में दुर्गा व चंडी देवी की पूजा का सहारा लिया यहाँ तक कि अपना गोत्र भी बता डाला जिसकी आज तक उन्होंने ज़रुरत महसूस नहीं की थी।

गोत्र बताने की नौबत इसलिए भी आई क्योंकि भाजपाइयों ने उन्हें ममता बनर्जी के बजाए ‘ममता बेगम ‘ पुकारना शुरू कर दिया था। और यही निरर्थक एवं बेहूदा चुनाव प्रचार इस स्तर तक आ पहुंचा कि ममता बनर्जी ने राम बनाम दुर्गा का रूप ले रही इस चुनावी मुहिम में ‘स्थानीय व बाहरी’ का राग भी छेड़ दिया। गोया बंगाल के चुनाव को बंगाली व ग़ैर बंगाली के बीच हो रहा चुनाव प्रचारित करने की कोशिश की।

परन्तु भारतीय जनता पार्टी जिसे कि अपने विरोधियों द्वारा अपने ऊपर उछाले गए पत्थरों से ही अपना महल तैयार करने में पूरी महारत हासिल है,के द्वारा पिछले दिनों बाहरी और भीतरी की जो परिभाषा गढ़ी गयी वह वास्तव में आश्चर्यजनक थी। गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले दिनों एक जनसभा में कांग्रेस को बाहरी पार्टी बताते हुए कहा कि इसका नेतृत्व इटली का है। उनका इशारा सोनिया गांधी की ओर था।

इसी तरह उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा को विदेशी बताया। और तो और ममता के अल्पसंख्यक समर्थकों को घुसपैठिया बताते हुए शाह ने कहा कि ममता बाहरी लोगों के ‘वोट बैंक ‘ पर आश्रित हैं साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वे और प्रधानमंत्री मोदी जिन्हें ममता बाहर का बताती हैं,यहीं पैदा हुए हैं और यहीं की मिट्टी में मिल जाएंगे। अब आप सोचते रहिये और सफ़ाई देते रहिये कि जिस कांग्रेस पार्टी ने देश के स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई लड़ी और जो गांधी-नेहरू-पटेल की पार्टी थी वह इटली की पार्टी कैसे हो गयी? जो भारत में पैदा होकर कम्युनिस्ट विचारधारा को मानते हैं यानि पूंजीवादी व्यवस्था के घोर विरोधी हैं वे चीनी कैसे हो गए?

भाजपा ने स्वयं आसाम में सात मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा और बंगाल विधानसभा में भी भाजपा ने 9 मुस्लिम उम्मीदवारों पर दांव लगाया। परन्तु इनके मुस्लिम प्रत्याशी देशभक्त और राष्ट्रवादी हैं परन्तु ममता,कांग्रेस व कम्युनिस्टों के मुस्लिम प्रत्याशी चीनी,बांग्लादेशी,इटली के या राष्ट्रविरोधी आदि। अब जब भाजपा के इन आरोपों से पल्ला झाड़ने से समय बचेगा तभी तो विरोधी बता सकेंगे कि इसतरह का आरोप लगाने वाले स्वयं हिटलर और मुसोलिनी की विदेशी विचारधारा के अलंबरदार हैं और यह स्वयं अंग्रेज़ों से माफ़ी मांगने वालों की विरासत चला रहे हैं ?

गोया शब्दों की इन निरर्थक बानगियों और तुकबंदियों से साफ़ लगने लगा है कि देश के चतुर व चालबाज़ नेता अब यह समझ चुके हैं कि देश की जनता को स्कूल, कॉलेज,अस्पताल,फ़्लाई ओवर,सड़कों व अन्य जनहितकारी योजनाओं से कोई लेना देना नहीं। राजनैतिक दलों की नज़रों में आज इन वास्तविक मुद्दों से अधिक प्रभावी मुद्दे बाहरी-भीतरी,कांग्रेस इटली की,कम्युनिस्ट चीन के, ममता मुसलमान हैं, मंदिर-मस्जिद,पहले अयोध्या अब वाराणसी,लव जिहाद क़ानून,तीन तलाक़ क़ानून,एन आर सी/सी ए ए,कोरोना मरकज़ और जमाअत से फैलता है कुंभ से नहीं आदि रह गए हैं। बंगाल व आसाम का लगभग पूरा चुनाव सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की इसी नीति पर लड़ा गया है।

निश्चित रूप से अपने इस विभाजनकारी एजेंडे पर चलते हुए भाजपा को जो सफलता हासिल होती है पार्टी उसे अपनी दलीय नीतियों की जीत बताती है। यह हालात और यह राजनैतिक कलाबाज़ियां न तो देशहित में हैं न जनहित में,न ही इससे भारतीय लोकतंत्र का मान बढ़ता है न ही इन हथकंडों से देश की प्रतिष्ठा बढ़ती है। बजाए इसके यह एक दूसरे पर कीचड़ फेंकने जैसी गन्दी व ओछी राजनीति का द्योतक है। राजनेताओं द्वारा बाहरी भीतरी व इस तरह के अन्य दूसरे लोकलुभावन परन्तु लोक अहितकारी मुद्दे इसी लिए उछाले जाते हैं क्योंकि उनके पास जनहितकारी मुद्दों को उठाने व जन समस्याओं को सुलझाने का घोर अभाव है।

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