कोरोना : अपनी पीठ थपथपाने की बजाय काम करे दिल्ली सरकार

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-योगेश कुमार सोनी-

कोरोना को लेकर बीते मंगलवार दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सतेन्द्र जैन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि दिल्ली में तेरह हजार बेड और पर्याप्त संख्या में वेंटिलेटर मौजूद हैं, इसे लेकर लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है। जैन ने स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर ऐसे ही अन्य तमाम दावे किये लेकिन सवाल यही है कि राजधानी कि इतनी बिगड़ती हालत के बीच मंत्रीजी किस आधार पर अपनी प्रशंसा कर रहे हैं।

दिल्ली के लगभग सभी सरकारी अस्पतालों में हालत इतनी खराब है कि कोरोना पीड़ित रोगियों को दवा व उपचार तक तो मिल नहीं रहे हैं लेकिन बेड की उपलब्धता के दावे किये जा रहे हैं। इसके अलावा हालत यह है कि अन्य बीमारियों से ग्रस्त रोगियों का इलाज नहीं हो पा रहा है। उपचार न मिलने की वजह से हालात बद से बदतर होने लगे हैं। इसकी वजह से भी काफी संख्या में लोगों की जान जा रही है। किसी भी अस्पताल में एडमिट कराने के लिए लोग बड़े- से- बड़ा सिफारिश ढूंढ़ रहे हैं। दिल्ली, महाराष्ट्र व छत्तीसगढ़ के अलावा देश के तमाम राज्यों में एकबार फिर कोरोना बम फूटा है। देश एकबार फिर संकट से जूझ रहा है।

यदि प्राइवेट अस्पतालों की चर्चा करें तो वह पूर्ण रूप से अपनी जिम्मेदारियों से भागते नजर आ रहे हैं। कोरोना के मरीज को तो वे दूर से ही भगा देते हैं। अन्य रोगियों का भी इलाज करने से बच रहे हैं। जो लोग नियमित रूप से डायलिसिस व अन्य बीमारियों का इलाज करवा रहे हैं, उनको भी इलाज नहीं मिल पा रहा। केजरीवाल सरकार को प्राइवेट अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई करने में न जाने किस बात का डर है। जब देश में इस तरह का संकट है तो अपना फर्ज क्यों नहीं निभाया जा रहा।

बीते रविवार दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि जरूरी हो तो अस्पताल जाएं। अब कोई मुख्यमंत्री साहब से पूछे कि बिना जरूरी अस्पताल कौन जाता है। यदि किसी को छोटी-मोटी समस्या या बीमारी होगी तो वह आसपास के किसी डॉक्टर के पास जाता है और समस्या जब बड़ी हो तो किसी अस्पताल में जाता है। यदि गर्भवती महिलाओं की चर्चा करें तो सरकारी अस्पताल में उसे तीन महीने की गर्भवती होने पर अस्पताल में पंजीकरण करवाना अनिवार्य होता है। प्रसव होने तक पूरा इलाज संबंधित अस्पताल में चलता है।

वहीं दूसरी ओर अधिकतर मध्यमवर्गीय परिवार या पूंजीपति प्राइवेट अस्पतालों में प्रसव कराते हैं और जैसा कि शुरुआत से लेकर प्रसव तक वह भी उस अस्पताल से जुडे रहते हैं। लेकिन अब कोरोना के फिर से बढ़ते मामलों की वजह से ऐसे परिवारों को परेशानी यह आ रही है कि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं और अधिकतर प्राइवेट अस्पताल के मालिकों ने कोरोना के डर से फिर से अस्पताल बंद कर दिए। जो खुले हैं वे डिलीवरी केस नहीं ले रहे। दोनों ही स्थिति में लोगों को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

सरकारी अस्पताल प्रशासन का कहना है कि हमारे पास पहले से ही अपनी क्षमता से अधिक केस होते हैं। यदि किसी ने अपना पंजीकरण पहले से नहीं कराया हो तो उसका प्रसव हमारे यहां कानूनी तौर पर संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में कई लोग परेशान हो रहे हैं। आखिर करें तो क्या करें? गर्भवती महिलाओं को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे तमाम परिवार सरकारी अस्पतालों के बाहर परेशान होते दिखाई दे रहे हैं।

बीते दिनों दिल्ली स्थित देश के दो नामचीन अस्पताल गंगाराम व एम्स में करीब सत्तर डॉक्टर कोरोना पॉजिटिव पाए गए। यह वे डॉक्टर थे जो गंभीर बीमारियों का इलाज व ऑपरेशन करते हैं लेकिन इन सभी को कोरोना होने की वजह से सभी ऑपरेशन स्थगित हो गए। इन अस्पतालों में ऑपरेशन की तारीख का छह महीने से लेकर एक साल तक इंतजार करना होता है। जो लोग इतने लंबे समय से इंतजार कर रहे थे और जब आगे फिर सालभर बाद की तारीख मिल गई तो उनको कितना प्रभावित होना पड़ रहा है।

ऐसी स्थिति में केंद्र व राज्य सरकारों को बेहद गंभीरता से काम करने की जरूरत है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि कोरोना के मरीजों की संख्या में अचानक इजाफा होने से स्वास्थ्य विभाग के हाथ-पैर फूल गए लेकिन अस्पतालों की व्यवस्था को सही करना चाहिए। जनसंख्या और मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए राजधानी के अस्पतालों में वेंटिलेटर की संख्या सामान्य तौर पर भी बहुत कम है, जिसके लिए केजरीवाल को कई बार अवगत कराया जा चुका बावजूद इसके कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। ऐसे कठिन समय में उनके मंत्री यह कह रहे हैं कि पर्याप्त बेड और वेंटिलेटर उपलब्ध हैं।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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