चंदे की चाँदनी और मुस्कुराता चाँद

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कहते हैं प्रेम पत्र पर लिखा प्रेमिका का नाम विवाह के निमंत्रण पत्र पर नहीं होता। यदि वह प्रेम पत्र मेनिफेस्टो बन जाए को विवाह का निमंत्रण पत्र सरकारी बजट बनने में देर नहीं लगती। झूठे गड़रिए का शेर अब चुनावी वादा बन गया है। ठीक चुनावों से पहले ‘यह देखो शेर-वह देखो शेर’ कह-कहकर मतदाता का मत बहुत जल्द उसके जीवन का तम बन जाता है। ऐसा नहीं है कि शेर आता नहीं है, आता तो जरूर है लेकिन कभी प्राइवेटीकरण के रूप में तो कभी बेरोजगारी के रूप में। कभी महंगाई के रूप में तो कभी अत्याचार के रूप में। ऐसे शेर बेरोजगारों का मांस बड़े चाव से खाते हैं। आम जनता का नमकीन खून बड़े चाव से पीते हैं।

ऐसे शेर चुनाव से पहले साधु और बाद में आदमखोर बन जाते हैं। देश को जंगल बनाकर अपना जंगलराज चलाते हैं। मनमानी कानून बनाये जाते हैं। विरोध करने वाले आए दिन आदमखोर का शिकार बनते जाते हैं। रात के अंधेरे में दिन के उजाले का हवाला देकर संविधान के नाम पर विषमधान वाले कानून बना दिए जाते हैं। फिर इन विषमताओं में कोई जात के नाम पर तो कोई धर्म के नाम पर, कोई भाषा के नाम पर, कोई प्रांत के नाम पर अलग-थलग कर आम लोगों को अपने पैरों तले कुचलकर उनकी गुठली निकाल दी जाती है। इन शेरों को देश की रीढ़ की हड्डी टूट जाने की कोई परवाह नहीं होती। उन्हें तो रीढ़ की हड्डी से लिपटा मांस पसंद होता है। ये जंगल में हर गुनाह करते हैं लेकिन अपने पैरों के निशान मतदाता के उंगली पर लगी स्याही से मिटाते जाते हैं।

सहायता वाले हाथ जब पंजा बनकर आगे बढ़े तब समझ जाना कि वह किसी की खाल खींचने वाला है। इन शेरों से बचाने के लिए अपने धनुषबाणों के साथ न तो कोई बिरसा मुंडा आयेंगे न तो ज्यादती सहने के लिए सरदार पटेल। आज भगवान राम खुद वोटों की राजनीति में बंधकर घबरा रहे हैं। उन्हें लोगों के दिलोंदिमाग से उतारकर अयोध्या में बांधने की कोशिश की जा रही है। काश आज वो राम होते तो अपने नाम पर उगाही किए जाने वाले चंदे से लोगों के चेहरे पर मुस्कान का चांद खिला देते। दुर्भाग्य से हमारे आगे-पीछे हमारे सिवाय कोई नहीं है। अंग्रेजों की चाल हमारे राजनेताओं की खाल में बस गयी। हमारी एकता को टुकड़े-टुकड़े गैंग में बांट दिया गया और हमें अनिर्वाचित रूप से टुकड़ों पर पलने वाली जिंदगी का पर्याय बना दिया गया। टुकड़े टूट कर टुकुर-टुकुर अपनी मौत की राह देख रहे हैं और शेर अपना स्वार्थ का पंजा सब पर मारने के लिए तैयार बैठा है। शेर की खाल ओढ़े गीदड़ अपने बिरादरी के एक-दो लोगों के लिए जनता रूपी भोले:भाले जीवों की बलि चढ़ाकर जंगल को नेस्तनाबूद करने के लिए मनचाहा स्वांग रचा रहा है।

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