Eid al-Adha or Bakrid 2021: हर मुस्लिम नहीं दे सकता कुर्बानी, जानें क्या कहते हैं नियम

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Webvarta Desk: Rule of Eid Al Adha Qurbani: मुस्लिम संप्रदाय में बकरीद (Eid al-Adha or Bakrid 2021) को कुर्बानी (Qurbani or Udhiyah) के त्योहार के रूप में मनाए जाने की परंपरा है। इब्रा‍हीम अलैय सलाम एक पैगंबर गुजरे हैं, जिन्हें ख्वाब में अल्लाह का हुक्म हुआ कि वे अपने प्यारे बेटे इस्माईल (जो बाद में पैगंबर हुए) को अल्लाह की राह में कुर्बान कर दें। 

यह इब्राहीम अलैय सलाम के लिए एक इम्तिहान (Eid al-Adha or Bakrid 2021) था, जिसमें एक तरफ थी अपने बेटे से मुहब्बत और एक तरफ था अल्लाह का हुक्म। इब्राहीम अलैय सलाम ने सिर्फ और सिर्फ अल्लाह के हुक्म को पूरा किया और अल्लाह को राजी करने की नीयत से अपने लख्ते जिगर इस्माईल अलैय सलाम की कुर्बानी (Qurbani or Udhiyah) देने को तैयार हो गए।

अल्लाह रहीमो करीम है और वह तो दिल के हाल जानता है। जैसे ही इब्राहीम अलैय सलाम छुरी लेकर अपने बेटे को कुर्बान (Qurbani or Udhiyah) करने लगे, वैसे ही फरिश्तों के सरदार जिब्रील अमीन ने बिजली की तेजी से इस्माईल अलैय सलाम को छुरी के नीचे से हटाकर उनकी जगह एक मेमने को रख दिया। इस तरह इब्राहीम अलैय सलाम के हाथों मेमने के जिब्हा होने के साथ पहली कुर्बानी हुई। इसके बाद जिब्रील अमीन ने इब्राहीम अलैय सलाम को खुशखबरी सुनाई कि अल्लाह ने आपकी कुर्बानी कुबूल कर ली है और अल्लाह आपकी कुर्बानी से राजी है।

क्या हैं कुर्बानी का मकसद

बेशक अल्लाह दिलों के हाल जानता है और वह खूब समझता है कि बंदा जो कुर्बानी दे रहा है, उसके पीछे उसकी क्या नीयत है। जब बंदा अल्लाह का हुक्म मानकर महज अल्लाह की रजा के लिए कुर्बानी करेगा तो यकीनन वह अल्लाह की रजा हासिल करेगा, लेकिन अगर कुर्बानी करने में दिखावा या तकब्बुर आ गया तो उसका सवाब जाता रहेगा। कुर्बानी इज्जत के लिए नहीं की जाए, बल्कि इसे अल्लाह की इबादत समझकर किया जाए। अल्लाह हमें और आपको कहने से ज्यादा अमल की तौफीक दे।

गर कुर्बानी नहीं दी तो…

ईद उल अजहा पर कुर्बानी देना वाजिब है। वाजिब का मुकाम फर्ज से ठीक नीचे है। अगर साहिबे हैसियत होते हुए भी किसी शख्स ने कुर्बानी नहीं दी तो वह गुनाहगार होगा। जरूरी नहीं कि कुर्बानी किसी महँगे जानदार की की जाए। हर जगह जामतखानों में कुर्बानी के हिस्से होते हैं, आप उसमें भी हिस्सेदार बन सकते हैं।

अगर किसी शख्स ने साहिबे हैसियत होते हुए कई सालों से कुर्बानी नहीं दी है तो वह साल के बीच में सदका करके इसे अदा कर सकता है। सदका एक बार में न करके थोड़ा-थोड़ा भी दिया जा सकता है। सदके के जरिये से ही मरहूमों की रूह को सवाब पहुंचाया जा सकता है।

कुर्बानी का हिस्सा

कुर्बानी के गोश्त के तीन हिस्से करने की शरीयत में सलाह है। एक हिस्सा गरीबों में तकसीम किया जाए, दूसरा हिस्सा अपने दोस्त अहबाब के लिए इस्तेमाल किया जाए और तीसरा हिस्सा अपने घर में इस्तेमाल किया जाए। तीन हिस्से करना जरूरी नहीं है, अगर खानदान बड़ा है तो उसमें दो हिस्से या ज्यादा भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं। गरीबों में गोश्त तकसीम करना मुफीद है।

कुर्बानी के नियम

ईद उल अजहा के दिन हर कोई अल्लाह को कुर्बानी देना चाहता है लेकिन कुर्बानी के कुछ नियम हैं। इन नियमों के आधार पर ही अल्लाह को कुर्बानी दी जा सकती है। आइए जानते हैं कि कुर्बानी के नियम क्या हैं…

  • इस्लाम में गरीबों और मजलूमों का खास ध्यान रखने की परंपरा है। बकरीद पर अल्लाह के पास ह‌ड्ड‌ियां, मांस या फिर खून नहीं पहुंचता है, उनके पास खुशु पहुंचती है यानी देने का जज्‍बा। आप समाज की भलाई के लिए क्या और कितना कर सकते हैं। किसी भी जानवर की कुर्बानी केवल एक प्रतिकात्मक कुर्बानी है।
  • कुर्बानी के लिए जानवर जैसे बकरा आदि की कोई कीमत नहीं होती है। कुर्बानी के लिए जानवर को आप चाहें 200 का खरीदें या फिर 2000 का, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। अल्लाह के यहां हर कोई बराबर होता है।
  • नियम के अनुसार, जिसके पास 613 से 614 ग्राम चांदी हो या आज के हिसाब से इतनी चांदी की कीमत के बराबर धन हो। केवल वही लोगों को कुर्बानी का फर्ज है यानी उसे कुर्बानी देनी चाहिए।
  • अगर कोई व्यक्ति पहले से कर्ज में है तो वह कुर्बानी नहीं दे सकता। कुर्बानी केवल वही दे सकता है, जो किसी भी कर्ज में ना हो। अगर आप कर्ज में हैं तो पहले उसको चुकता करें तभी आपकी कुर्बानी मंजूर होगी।
  • अगर आप अपनी कमाई का ढाई फीसदी दान में देते हैं। साथ ही समाज की भलाई के लिए हमेशा खुद और धन को आगे रखते हैं। उनके लिए कुर्बानी जरूरी नहीं है। समाज की भलाई का कार्य हमेशा अल्लाह को खुश करता है।
  • कुर्बानी देने से पहले ध्यान रखें कि आप जिस जानवर की कुर्बानी देने जा रहे हों, उसे कोई शारीरिक बीमारी या फिर भैंगापन ना हो, सींग या कान का अधिकतर भाग टूटा ना हो नहीं दी जा सकती। साथ ही अगर पशु छोटा है तो उसकी भी कुर्बानी मान्य नहीं होगी।
  • ईद की नमाज के बाद कुर्बानी के गोश्त के तीन हिस्से किए जाते हैं। पहला हिस्सा खुद के इस्तेमाल के लिए, दूसरा गरीबों के लिए और तीसरा अपने संबंधियों के लिए किया जाता है। वैसे ज्यादातर लोग सभी हिस्सों को गरीबों में बांट देते हैं।

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