किताब लिखकर बड़ा खुलासा कर सकते हैं गुलाम नबी आजाद, इंदिरा-सोनिया के खोलेंगे सीक्रेट्स!

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Webvarta Desk: Ghulam Nabi Azad Book: पिछले एक हफ्ते में हमने राजनीतिक (Political News) हलकों में काफी हलचल देखी। जहां एक ओर राज्‍यसभा (Rajya Sabha) से गुलाम नबी आजाद (Ghulam Nabi Azad) की विदाई हुई तो बिहार में मंत्रिमंडल का विस्‍तार हुआ। दोनों ही जगह के घटनाक्रम में नाटकीयता देखने को मिली।

राज्‍यसभा (Rajya Sabha) में आजाद (Ghulam Nabi Azad) को विदाई देते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) की आंखें छलछला आईं। बिहार में तो मुकेश सहनी चुनाव हारने के बावजूद मंत्री बना दिए गए। राजस्‍थान की राजनीति में बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए चिंता बढ़ रही है। असम में विधानसभा चुनाव देखते हुए बीजेपी फायदा उठाने के मूड में है।

किताब लिखेंगे गुलाम नबी?

राज्यसभा (Rajya Sabha) में पिछले हफ्ते गुलाम नबी आजाद (Ghulam Nabi Azad) की विदाई के मौके पर जो कुछ हुआ, वह अप्रत्याशित था। पहले कभी ऐसा मौका नहीं देखा गया, जब कोई प्रधानमंत्री किसी अन्य पार्टी के नेता का कार्यकाल पूरा होने पर उससे जुड़े किसी संस्मरण पर इतना भावुक हुए हों। खैर, उसके बाद से ही राजनीतिक गलियारों में अलग-अलग तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

पूरे घटनाक्रम को आजाद और बीजेपी के बीच बढ़ती नजदीकी के रूप में देखा जा रहा है। अनुच्छेद 370 को खत्म किए जाने के बाद कश्मीर की पॉलिटिक्स के मद्देनजर बीजेपी को भी एक अदद नामचीन कश्मीरी चेहरे की तलाश है।

इसी सिलसिले में कहा जा रहा है कि बीजेपी सीधे या फिर बैकडोर से गुलाम नबी आजाद को उपकृत कर सकती है। उपराष्ट्रपति को लेकर भी उनका नाम लिया जा रहा है, लेकिन अभी तो वेंकैया नायडू का कार्यकाल 2022 तक है।

ऐसे में अगर इस पद तक गुलाम नबी के पहुंचने की बात है, तो उसमें लंबा वक्त लगेगा और राजनीति में इतने लंबे वक्फे में बहुत कुछ बदल जाता है। गुलाम नबी के नजदीकी कुछ लोगों का कहना है कि राजनीति में उनके आगे का रास्ता क्या होगा, यह तय नहीं है लेकिन एक चीज लगभग तय है कि गुलाम नबी अपने राजनीतिक अनुभवों पर एक किताब लिख सकते हैं।

गुलाम नबी ने कांग्रेस में लंबा वक्त गुजारा है। वे इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया गांधी तक की ‘किचन कैबिनेट’ के मेंबर रहे हैं। एक तरह से वे किस्सों की खान हैं और बहुत सारे ‘सीक्रेट्स’ के राजदार भी हैं। इसी के मद्देनजर कहा जा रहा है कि अगर वे किताब लिखेंगे और ईमानदारी से लिखेंगे तो वह किसी धमाके से कम नहीं होगी।

सहनी की बनावटी की नाराजगी!

पिछले दिनों बिहार मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद मीडिया के जरिए इस तरह की खबरें आईं कि गठबंधन में शामिल विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) नाराज है। पार्टी के चीफ मुकेश सहनी इस मसले पर अमित शाह और जेपी नड्डा से बात करेंगे, लेकिन परदे के पीछे की कहानी कुछ और बताई जाती है। कहा जाता है कि वीआईपी को कैबिनेट में कभी भी एक से ज्यादा सीट देने की बात ही नहीं हुई थी। वह सीट खुद मुकेश सहनी ले चुके हैं, वह भी इलेक्शन हारने के बावजूद। सहनी खुद विधानसभा चुनाव हार गए थे, लेकिन उनकी पार्टी से चार विधायक जीते थे।

नीतीश कुमार की शपथ के साथ जब मंत्रिमंडल का गठन शुरू हुआ तो मुकेश सहनी ने मंत्री बनने की इच्छा जता दी। उन्हें मंत्री बनाने के लिए विधान परिषद भेजने का जुगाड़ करना पड़ा। नीतीश कुमार ने वह सब किया और चुनाव हारने के बावजूद उन्हें मंत्री बना दिया। जाहिर सी बात है कि पार्टी के जो विधायक जीत कर मंत्री बनने की ख्वाहिश में थे, उनके लिए यह एक बड़ा झटका था।

मुकेश सहनी के लिए भी यह शर्मिंदगी की बात थी कि हार कर भी उन्होंने जीतने वालों का हक छीन लिया। इसी के मद्देनजर उन्होंने अपनी पार्टी के विधायकों को भरोसा दिया था कि अगले विस्तार में कुछ लोगों को एडजस्ट करा देंगे। विस्तार में उनके दावे पर विचार ही नहीं हुआ और मुकेश सहनी को लगा कि उनके विधायक कहीं कोई बड़ा ‘खेल’ न कर दें, तो उन्होंने नाराजगी का लाबादा ओढ़ा।

पटना से दिल्ली चलकर अपनी बात रखने की बात कही। लेकिन इसमें कहीं कोई गंभीरता नहीं देखी गई। वैसे विधायक भी कोई दूध पीते बच्चे नहीं हैं। पटना के सियासी गलियारों में कहा जा रहा है कि दो-चार विधायकों वाली पार्टी के लोगों को पाला बदलने में कोई ज्यादा वक्त नहीं लगता। विधानसभा की सदस्यता भी खतरे में नहीं पड़ती। बीएसपी विधायक का उदाहरण सबसे ताजा है। एकमात्र विधायक थे, पाला बदलने के साथ ही मंत्री भी हो गए।

बेटे के लिए कुछ भी करेंगे

राजस्थान की पॉलिटिक्स में इस वक्त बीजेपी की अंदरूनी कलह की काफी चर्चा है। एक बार फिर वसुंधरा राजे खुद को स्टेट पॉलिटिक्स में प्रासंगिक बनाए रखने की हर मुमकिन कोशिश कर रही हैं, लेकिन इस बार उनके विरोधी उन पर भारी पड़ते दिख रहे हैं। वसुंधरा राजे को भी मालूम है कि एक सीमा से अधिक जाने पर उन्हें फायदा कम, नुकसान ज्यादा होगा, इस वजह से वे काफी धैर्य भी दिखा रही हैं।

दूसरी ओर कांग्रेस में भी फिर से हलचल शुरू होने वाली है। दरअसल राजस्थान विधानसभा की चार सीटें खाली हो चुकी हैं और उन पर उप चुनाव होने हैं। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को यह अपने बेटे वैभव गहलोत के लिए मौका लग रहा है। अशोक गहलोत लंबे वक्त से अपने बेटे को राजनीति में स्थापित करने के लिए परेशान हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव के वक्त पार्टी आलाकमान की इच्छा के विपरीत जाते हुए उन्होंने अपने बेटे के लिए टिकट लिया था और पूरी सरकार को उसके प्रचार में उतार देने के बावजूद कांग्रेस को वह सीट हारनी पड़ गई थी।

अंदरखाने यहीं से अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच तकरार भी बढ़ी थी। इल्जाम यह था कि वैभव को हरवाने में सचिन पायलट की भूमिका रही है। अब जब विधानसभा की चार सीटों के लिए उप चुनाव होने हैं, अशोक गहलोत एक बार फिर अपने बेटे के लिए इनमें से एक सीट चाहते हैं। लेकिन यह सब इतना आसान नहीं होगा।

एक बार फिर से लॉबीइंग शुरू हो गई है कि डेढ़ साल पहले जो शख्स लोकसभा का चुनाव हार गया हो, उसे विधानसभा के उप चुनाव के लिए टिकट क्यों दिया जाए? अगर मुख्यमंत्री के बेटे के लिए यह फॉर्म्युला फिट बैठता है तो बाकी की तीन सीटों पर भी यही लागू होना चाहिए और लोकसभा चुनाव हार चुके उम्मीदवारों को ही टिकट दे देना चाहिए।

तरुण गोगोई से कितना फायदा?

असम विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीने बाकी हैं। पिछले चुनाव में बीजेपी ने इस राज्य में पहली बार जीत कर सबको चौंका दिया था। कांग्रेस की हार के लिए उस समय के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई को जिम्मेदार माना गया था, जो कि तब तक लगातार तीन टर्म से सीएम हो रहे थे। उनकी उम्र भी 80 से अधिक हो गई थी, लेकिन नई पीढ़ी के लिए पद छोड़ने को वे तैयार नहीं थे। जब 2016 के चुनाव में भी उन्होंने पार्टी का चेहरा बनने की जिद नहीं छोड़ी, तो हेमंत बिस्वा सरमा ने पार्टी छोड़ दी, जो उस समय कांग्रेस में सीएम फेस बनने की उम्मीद में थे।

बीजेपी ने उस चुनाव में गोगोई सरकार में करप्शन को एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था। पिछले साल नवंबर में गोगोई की मौत हो गई और इस साल 26 जनवरी के मौके पर केंद्र सरकार ने उन्हें मरणोपरांत पद्म भूषण से नवाजा है। माना जा रहा है कि गोगोई की मौत से उपजी सहानुभूति हासिल करने के लिए यह कदम केंद्र सरकार की तरफ से उठाया गया है।

भले ही उनके नेतृत्व में कांग्रेस पिछला चुनाव हार गई हो, लेकिन तरुण गोगोई की पकड़ राज्य में मजबूत मानी जाती रही है। देखने वाली बात होगी कि बीजेपी को चुनाव में गोगोई के जरिए कितना फायदा होता है। जहां तक बात कांग्रेस की है तो फिलहाल वह एआईयूडीएफ के साथ गठबंधन में नफा-नुकसान को आंकने में व्यस्त है।

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